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Chhichhore Movie Review: बिछड़े दोस्तों के फिर से मिलने की कहानी है 'छिछोरे', दोस्तों के साथ हॉस्टल या पीजी में रहे हैं तो जरूर देखें

05 September, 2019 07:59:43 PM

सुशांत सिंह राजपूत और श्रद्धा कपूर का बेटा एक बिल्डिंग से गिर जाता है और अब गंभीर रूप से घायल है। कारण ये है कि वह सोचता है कि वह अपने माता-पिता की आंखों में हारा हुआ है। अस्पताल में अपने जीवन के लिए लड़ते हुए, उसके माता-पिता के साथ कॉलेज के  6-7 छिछोरे दोस्तों की कहानी क्या उसे बचा पाएगी?

बॉलीवुड तड़का टीम। सुशांत सिंह राजपूत और श्रद्धा कपूर का बेटा एक बिल्डिंग से गिर जाता है और अब गंभीर रूप से घायल है। कारण ये है कि वह सोचता है कि वह अपने माता-पिता की आंखों में हारा हुआ है। अस्पताल में अपने जीवन के लिए लड़ते हुए, उसके माता-पिता के साथ कॉलेज के  6-7 छिछोरे दोस्तों की कहानी क्या उसे बचा पाएगी? क्या वह खुद को हारा हुआ मानने से रोकेगा? खैर, यही कहानी है।

Bollywood Tadka, Chhichhore Review

सबसे पहले, इस बात को बाहर निकाल दें, यह '3 इडिएट्स' नहीं है। यह एक अलग कहानी है, समानता बस ये है कि इसके मूल में भी दोस्ती है और यहां तक ​​कि फिल्म के एन्ड में एक स्ट्रांग मैसेज है। नितेश तिवारी का निर्देशन बहुत ही शानदार है। वह कहीं भी लड़खड़ाया नहीं है। ऐसा लगता है कि कहानी उनके दिल से सही निकली है और यह शो शुरू होने के पहले 15 मिनट में ही आपके साथ खूबसूरती से जुड़ जाती है। उनके पास कॉलेज के एक सीन में हंसाने और अगले ही पल सेट होने वाले सीन में रुला देने की अद्भुत क्षमता है। कहानी के साथ सीन बहुत सफाई से पिरोये गए हैं। 'चिल्लर पार्टी ’, 'भूतनाथ रिटर्न्स’ और ’दंगल’ के बाद लोग उनसे बहुत उम्मीद कर रहे थे, और उन्होंने छिछोरे से इस उम्मीद को पूरा किया है। 

Bollywood Tadka, Chhichhore Review

फिल्म के सभी किरदार शानदार हैं। ज्यादातर बॉलीवुड फ़िल्में हीरो के कंधों पर होती हैं, लेकिन 'छिछोरे' इसका अपवाद बन गई है। आप इसे सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म या श्रद्धा कपूर की फिल्म नहीं कह सकते। यह एक ताहिर राज भसीन फिल्म है, यह वरुण शर्मा की फिल्म है और इसी तरह बाकी कलाकारों के लिए भी। हर एक्टर को उचित स्क्रीन स्पेस दिया गया है और बस फिल्म के स्पेशल कैरेक्टर को फोकस किया है।

Bollywood Tadka, Chhichhore Review

फिल्म के पहले सीन से ही गोल्ड स्पॉट की बोतलों से लेकर ऊँची कमर वाले जींस पैंट तक आपको यह सोचने के लिए प्रेरित किया जाएगा कि जब आप 45 वर्ष के हो गए हैं तो आपका जीवन कैसे बदल गया है, वहीँ दूसरी तरफ आपको ये भी लगेगा कि आप अब उन दोस्तों के टच में क्यों नहीं रहे, जिनके बिना आप एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकते थे। कुल मिलाकर फिल्म आपके कॉलेज जीवन के उन 4-5 वर्षों की याद दिला ही देगी। फिल्म में अमलेंदु चौधरी की सिनेमैटोग्राफी परफेक्ट है। जिस तरह से वह 1992 से सीन्स को आज के समय में सही सटीकता के साथ लाए हैं वह सराहनीय है।

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प्रीतम के गीतों को सही फिट किया गया है क्योंकि वे कुछ ऐसा नहीं करते हैं जो आपको कहानी से दूर ले जाए। ज्यादातर गाने कहानी को आगे बढ़ाते नजर आते हैं। फिल्म का लास्ट गाना 'फिकर नॉट’ भी अच्छी तरह से समयबद्ध है। 

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क्लाइमैक्स की बात करें, तो यह फिल्म वास्तव में एक मजबूत संदेश देती है। जबकि आप में से बहुत से लोग इसे एजुकेशनल सिस्टम से जोड़ कर '3 इडियट्स' से भी जोड़ सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। फिल्म का मैसेज देखकर हो सकता है आप अपने पैरेंट्स या बच्चों को फ़ोन लगाएं। कई बार संदेश देने वाली फिल्म वास्तव में उबाऊ हो जाती है और क्लाइमैक्स में उपदेश देती है लेकिन यकीन मानिए यह उन फिल्मों में से नहीं है।

 

फिल्म के बारे में सबसे अच्छा हिस्सा पात्रों की सापेक्षता है। हम सभी ने अपनी कॉलेज लाइफ में एक 'सेक्सा' देखा है जो पूरे दिन सेक्स के बारे में सोचता रहता है, एक 'डेरेक' देखा है है जो अट्रेक्टिव है लेकिन हमेशा अपने कमरे में एकांत में रहता है, एक 'बेवड़ा' है जो हर दिन शराब छोड़ने के बारे में सोचता है, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं कर पाता है। अगर आप कभी किसी हॉस्टल में या दोस्तों के साथ पीजी में रहे हैं तो आप पहले ही सीन से इस फिल्म से जुड़ जाएंगे। 


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