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Movie Review: मकान मालिक और किराएदार की लंबी खींचतान की कहानी है 'गुलाबो सिताबो'

12 June, 2020 01:13:36 PM

जिसका फैंस को बेसब्री से इंतजार था वो फिल्म यानि गुलाब सिताबो 12 जून को ऑनलाइन रिलीज हो चुकी है। अमिताभ और आयुष्मान की स्टार्र गुलाबो-सिताबो अपनी रिलीजिंग को लेकर काफी दिनों से सुर्खियों बनी हुई थी। अमेजन प्राइम पर रिलीज हुई इस फिल्म को खूब पसंद किया जा रहा है, वहीं कईयों को इसकी कहानी नहीं भाई।

बॉलीवुड तड़का टीम. फैंस को जिसका बेसब्री से इंतजार था वो फिल्म यानि 'गुलाबो सिताबो' 12 जून को ऑनलाइन रिलीज हो चुकी है। अमिताभ और आयुष्मान की स्टार्र 'गुलाबो-सिताबो' रिलीजिंग को लेकर काफी दिनों से सुर्खियों बनी हुई थी। अमेजन प्राइम पर रिलीज हुई इस फिल्म को लोगों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है, वहीं कईयों को इसकी कहानी नहीं भाई।  अगर आप भी फिल्म देखने की तैयारी में हैं तो जान लें एक बार फिल्म का रिव्यू...

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कहानी
फिल्म की कहानी मकान मालिक और किराएदार की तिकडमबाजी के इर्द-गिर्द घूमती है। जिसमें 78 साल का मिर्जा (अमिताभ बच्चन) एक बहुत ही लालची, झगडालू औ कंजूस स्वभाव का आदमी है, जिसकी जान जर्जर हो चुकी हवेली में बसती है। हवेली का नाम फातिमा महल है। सालों पुरानी उस हवेली में कई किराएदार रहते हैं, जिनमें से एक बांके रस्तोगी ( आयुष्मान खुराना) है। बांके हवेली में अपनी मां और तीन बहनों के साथ रहता है। छठी तक पढ़ा है और आटा चक्की की दुकान चलाता है।
मिर्जा और बांके की आपस में बिलकुल नहीं बनती। मिर्जा बांके को काफी परेशान करता है और उनसे हवेली से निकालना चाहती है। इस तरह मकान मालिक और किराएदार के बीच काफी लंबी खीचतान चलती रहती है। फिल्म में मोड़ तब आता है जब, मिर्जा एक वकील के साथ मिलकर बिल्डर को हवेली बेचने की तैयारी कर लेता है। उधर बांके हवेली से निकलने को तैयार नहीं है। वो एलआईजी फ्लैट के लालच में आर्कियोलॉजी विभाग के एक अधिकारी से मिलकर इसे पुराने विभाग को बेचने का प्लान बना लेता है, मगर बेगम का एक मास्टर स्ट्रोक मिर्ज़ा और बांके की योजनाओं पर पानी फेर देता है और दोनों को ही हवेली से निकलना पड़ता है, जो दोनों की सबसे बड़ी दुश्मनी की जड़ थी। 

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एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें को अमिताभ 78 साल के बूढे़ मिर्जे के किरदार में फिट बैठे हैं, वहीं आयुष्मान की एक्टिंग भी सराहनीय है। उनमें असली किराएदार की भावना देखने को मिली है। फिल्म के डायलॉग भी अच्छे है, लोगों के दिलों में छाप छोड़ सकते हैं।

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डायरेक्शन
डायरेक्टर शूजित सरकार ने फिल्म को प्रभावी बनाने के लिए खूब मेहनत की है, उनकी मेहनत पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। मिर्जा और बांके की स्थिति को कॉस्टयूम डिजाइनर, प्रोस्थेटिक मेकअप आर्टिस्ट ने असरदार तरीके से जाहिर किया है। लेखिका जूही चतुर्वेदी की कहानी दमदार है।


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