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फिल्म रिव्यू: ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ में समाज के लिए अच्छा सदेंश

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12 August, 2017 09:12:40 PM

मुंबईः स्वच्छ भारत अभियान का सन्देश देने वाली फिल्म ‘टॉयलेट:एक प्रेम कथा’ के रिलीज़ के पहले दिन दर्शकों को उसने जुटा लिया, लेकिन फिल्म खत्म होने तक उन्हें सहेज नहीं पाए। फिल्म के लिए अक्षय कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी मिले और प्रधानमंत्री ने फिल्म की तारीफ भी किया था लेकिन दर्शकों ने इसे नकार दिया। 

‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ एक ऐसी फिल्म है जो लोगों की उस अंधविश्वासी और दकियानूसी सोच पर अटैक करती है जो अपने हिसाब से सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित कर लेते हैं। ये बहुत ही साधारण फिल्म है जो उन्हीं चीजों को बड़े पर्दे पर दिखाती है जो हमारे आस पास हो रही हैं या फिर हम काफी समय से देखते आ रहे हैं। चाहें वो बात बिल्ली के रास्ता काट जाने के बाद वो रास्ता बदल लेने का हो या फिर ब्याह के समय कुंडली और दोष को ध्यान में रखकर शादी रचाने का हो। उस सोच का ही नतीजा है कि आज भी घर में शौचालय की बात आते ही ये सुनने को मिलता है कि ‘जिस आंगन में तुलसी है वहां शौचालय कैसे बन सकता है।’ इस फिल्म के जरिए ये लोगों को ये घर में शौचालय के महत्व को एक प्रेम कहानी के जरिए समझाने की कोशिश की गई है।  

 

सदियों से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं हो शौच के लिए सुबह-शाम बाहर खेतों में जाती हैं। मर्द तो खुले में कहीं भी बैठ जाते हैं लेकिन औरतों को तो पेट पकड़कर शाम होने का इंतजार करना पड़ता है। लेकिन वो आखिर कब तक ऐसा करेंगी। जब कोई एजुकेटेड महिला घर में टॉयलेट की मांग करे तो उसे ये ताना मारा जाता है कि पढ़ने लिखने के बाद दिमाग खराब हो जाता है, सभ्यता की कद्र नहीं होती… इत्यादि-इत्यादि। 

 

इस फिल्म में ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि महिलाओं को खुद की इज्जत करनी चाहिए और बाहर जाने से ऐतराज जताना चाहिए। महिलाओं को घर से बाहर जाने की आजादी हो लेकिन वो शौच के लिए नहीं। 

देखा जाए तो फिल्म का कॉन्सैप्ट बहुत ही बढ़िया है। फिल्म में हमेशा की तरह अक्षय ने कमाल का अभिनय किया है और भूमि पेडनेकर ने भी अच्छी परफ़ॉर्मेंस दी है। बहुत कम फिल्में होती हैं जो समाज में कुछ अच्छा सदेंश देकर जाती है, पर ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा जैसी फिल्में समाज में बदलाव जरूर लाती है। 


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